गुटका: मीठा ज़हर जो हर दिन मारता है।

अदनान एक 14 साल का लड़का था, जो हमेशा मुस्कुराता था। मोहल्ले की गलियों में उसकी हँसी गूंजती थी और उसके पिता रईस मियाँ को उस पर बड़ा गर्व था। रईस मियाँ एक दर्जी थे, मेहनतकश और ज़मीन से जुड़े इंसान। उनकी बस एक ख्वाहिश थी — अदनान को पढ़ा-लिखाकर एक अच्छा इंसान बनाना।

लेकिन एक आदत थी, जो रईस मियाँ की ज़िंदगी को धीरे-धीरे अंदर से खा रही थी — गुटका।

शुरुआत बस एक “आदत” से हुई थी

रईस मियाँ को गुटका खाना स्कूल के दिनों से लग गया था। पहले शौक था, फिर आदत बनी, और आखिर में ज़रूरत। दिन में कई बार छोटे-छोटे पाउच फाड़कर मुँह में डालना अब उनका रोज़ का नियम बन गया था। अदनान कई बार देखता, कभी सवाल करता, तो रईस मियाँ हँसकर टाल देते, “बेटा, बस यूं ही… आदत है, छोड़ दूँगा एक दिन।”

पर वह “एक दिन” कभी नहीं आया।

धीरे-धीरे मुस्कान फीकी होने लगी

कुछ साल बीते। अदनान अब दसवीं में था। पढ़ाई में होशियार, लेकिन पिता की तबीयत ने उसकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी। रईस मियाँ के मुँह में अचानक छाले बनने लगे। मुँह खोलने में दिक्कत, जबड़े में अकड़न… और फिर आया वो दिन, जब डॉक्टर ने साफ कहा:

“आपको ओरल कैंसर है, स्टेज-2। गुटका इसका कारण है।”

          अदनान सन्न था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो गुस्सा करे, रोए, या पिता को संभाले।

इलाज, तकलीफ़ और टूटा घर का सपना

इलाज शुरू हुआ — कीमोथेरेपी, दवाइयाँ, ऑपरेशन की बात — और साथ में बढ़ते बिल। रईस मियाँ की सिलाई की दुकान बंद हो गई, घर चलाना मुश्किल हो गया। अदनान ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, माँ ने पास के घरों में काम करना शुरू किया।

रईस मियाँ हर दिन टूटते जा रहे थे, शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी।

एक दिन उन्होंने अदनान का हाथ थामा और कहा:

“बेटा, मेरी ये मुस्कान अगर तुझे कभी प्यारी थी… तो किसी दिन गुटका खाने की सोचना भी मत। मैं अपनी आदत की कीमत अपनी ज़िंदगी से चुका रहा हूँ। तू अपना भविष्य मत गँवाना…”

अदनान की आँखें नम हो गईं।

एक छोटी आदत, जो ज़िंदगी ले गई

रईस मियाँ कैंसर से लड़ते रहे, लेकिन शरीर ने जवाब दे दिया। अदनान के बोर्ड एग्ज़ाम्स से ठीक पहले, रईस मियाँ चल बसे।

घर में अब वो हँसी नहीं गूंजती थी।

पर अदनान ने उनकी आखिरी बात को अपनी ताकत बना लिया। उसने मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया — कैंसर रिसर्चर बनने का सपना लेकर। और आज वो गुटका से पीड़ित मरीज़ों के लिए निःशुल्क काउंसलिंग कैंप चलाता है।

एक सीख जो सबके लिए है

गुटका सिर्फ एक आदत नहीं, एक धीमा ज़हर है जो न केवल इंसान को मारता है, बल्कि उसके अपनों की ज़िंदगी भी निगल जाता है।

रईस मियाँ चले गए, पर उनकी कहानी आज भी सिखाती है — अगर वक़्त रहते न रुके, तो मुस्कान भी मिट सकती है।

गुटका, भारत सहित कई एशियाई देशों में अत्यधिक उपभोग किया जाने वाला एक नशीला पदार्थ है। इसका स्वाद मीठा हो सकता है, पर इसका प्रभाव जीवन पर जहरीला होता है। गुटका में मुख्य रूप से सुपारी, तंबाकू, कत्था, चूना और सुगंधित पदार्थ होते हैं। यह छोटे पाउच में बड़ी आसानी से दुकानों पर बिकता है और हर वर्ग के लोग इसे इस्तेमाल करते हैं — विशेष रूप से युवा वर्ग। इस लेख में हम गुटका से होने वाले दुष्प्रभावों, इसके पीछे छिपे व्यापार, और इससे छुटकारा पाने के उपायों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

गुटका का आकर्षण और व्यापकता

गुटका की पैकेजिंग रंगीन होती है, इसमें स्वाद और सुगंध का मिश्रण होता है जो इसे लत की ओर ले जाता है। इसकी सबसे खतरनाक बात यह है कि यह खुलेआम, कम कीमत में और बिना किसी रोकटोक के बिकता है। स्कूल के बाहर से लेकर ऑफिस के गेट तक, हर जगह गुटका की बिक्री देखी जा सकती है।

गुटका की लत इतनी आसानी से लगती है कि एक बार शुरू करने के बाद इसे छोड़ना बेहद कठिन हो जाता है। यह लत धीरे-धीरे शरीर को अंदर से खोखला कर देती है।

गुटका के दुष्प्रभाव: एक धीमा ज़हर

गुटका के सेवन से शरीर पर कई गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख बीमारियाँ इस प्रकार हैं:

  1. मुँह का कैंसर (Oral Cancer)

गुटका में मौजूद तंबाकू और सुपारी मुँह के कैंसर के मुख्य कारण हैं। गालों के अंदर, जीभ, मसूड़े और जबड़े में गांठें बनना और अल्सर होना इसके शुरुआती लक्षण हैं।

  1. ओरल सबम्यूकोस फाइब्रोसिस (OSMF)

यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें मुँह की त्वचा सख्त हो जाती है, जिससे व्यक्ति को मुँह खोलने में कठिनाई होती है। यह गुटका सेवन करने वालों में आम बीमारी बन चुकी है।

  1. दाँत और मसूड़ों की समस्याएँ

गुटका के सेवन से दाँतों में पीलापन, सड़न, मसूड़ों से खून आना और दुर्गंध जैसी समस्याएँ होती हैं।

  1. पाचन तंत्र पर प्रभाव

गुटका चबाने से पेट में अम्लता, कब्ज, और आंतों में सूजन जैसी समस्याएँ होती हैं।

  1. हृदय रोग

तंबाकू के सेवन से हृदय की धमनियों में सिकुड़न हो सकती है, जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।

गुटका का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

गुटका न केवल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि यह समाज और देश की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है:

स्वास्थ्य खर्चों में वृद्धि: गुटका से होने वाली बीमारियों के इलाज में लोगों को अपनी जमापूंजी गंवानी पड़ती है।

परिवार पर प्रभाव: गुटका की लत से व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है, घरेलू हिंसा की संभावनाएं बढ़ती हैं।

काम करने की क्षमता में कमी: गुटका की लत से व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक क्षमता घट जाती है, जिससे वह कार्यक्षेत्र में पिछड़ जाता है।

देश की उत्पादकता पर असर: जब बड़ी संख्या में युवा गुटका की लत में फँस जाते हैं, तो देश की उत्पादक जनसंख्या कमजोर हो जाती है।

गुटका व्यापार: मुनाफा बनाम मानवता

गुटका उद्योग एक बहुत बड़ा व्यापार बन चुका है। लाखों करोड़ों का यह कारोबार मानव जीवन की कीमत पर चल रहा है। विज्ञापन, सोशल मीडिया, और फिल्मों के जरिए इसे स्टाइलका प्रतीक बना दिया गया है, खासकर युवाओं के बीच।

हालाँकि भारत सरकार ने गुटका और तंबाकू उत्पादों पर कई बार प्रतिबंध लगाया है, फिर भी यह अवैध रूप से या खुलेआम कई राज्यों में बिकता है।

कानूनी प्रयास और जागरूकता अभियान

भारत सरकार ने “गुटका निषेध कानून” के तहत कई राज्यों में गुटका के उत्पादन, बिक्री और भंडारण पर रोक लगाई है। इसके साथ-साथ तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर चेतावनी वाले चित्र और मैसेज अनिवार्य किए गए हैं।

राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम (NTCP) जैसे अभियानों के तहत स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थलों पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

गुटका की लत से कैसे छुटकारा पाएँ?

गुटका की लत छोड़ना कठिन ज़रूर है, लेकिन असंभव नहीं। सही मार्गदर्शन, मानसिक दृढ़ता और समर्थन से इसे छोड़ा जा सकता है।

  1. चिकित्सकीय सहायता लें:

डॉक्टर की सलाह से निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी (NRT), जैसे निकोटीन च्युइंग गम, लोजेन्जेस आदि से मदद मिल सकती है।

  1.  मनोवैज्ञानिक सहायता:

काउंसलिंग, व्यवहारिक थेरेपी और मोटिवेशनल इंटरव्यूइंग से मानसिक दृढ़ता बढ़ती है।

  1. परिवार और दोस्तों का सहयोग:

सकारात्मक माहौल और समर्थन गुटका छोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं।

  1. व्यायाम और ध्यान:

योग, मेडिटेशन और नियमित व्यायाम से स्ट्रेस कम होता है और आत्मनियंत्रण बढ़ता है।

 

गुटका सच में मीठा ज़हर है इसका स्वाद भले ही लुभावना लगे, लेकिन यह धीरेधीरे शरीर को मौत की ओर ले जाता है। गुटका से होने वाली बीमारियाँ केवल व्यक्ति की जान लेती हैं, बल्कि उसके परिवार और समाज पर भी गहरा असर डालती हैं। इस मीठे ज़हर से बचना और दूसरों को बचाना हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी है।

यदि हम एक तंबाकू-मुक्त भारत की कल्पना करते हैं, तो हमें आज ही से गुटका के खिलाफ खड़े होना होगा — खुद के लिए, अपने परिवार के लिए, और आने वाली पीढ़ियों के लिए।

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