
आज के तेज़-तर्रार जीवन में पैकेट वाला दूध हर घर की जरूरत बन चुका है। इसकी सहज उपलब्धता, लंबी शेल्फ लाइफ और साफ-सफाई के वादों ने इसे भारत के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में खूब लोकप्रिय बनाया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह दूध वाकई उतना ही शुद्ध और सेहतमंद है जितना इसे बताया जाता है?
इस लेख में हम जानेंगे पैकेट वाले दूध की सच्चाई, इसमें छिपे फायदे-नुकसान, इसके पीछे की प्रोसेसिंग, और कुछ चौंकाने वाले तथ्य और आंकड़े जो शायद आपने पहले न सुने हों।
पैकेट वाले दूध की लोकप्रियता
भारत में दूध की खपत
भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) के अनुसार, 2023 में भारत में दूध का उत्पादन 22.2 करोड़ टन से अधिक रहा।
इसमें से करीब 60% से अधिक दूध खुले (loose milk) रूप में बिकता है, जबकि 40% दूध पैकेज्ड यानी प्रोसेस्ड और पैक किया गया होता है।
बढ़ती मांग का कारण
आसान उपलब्धता (दूध की थैलियाँ किराना स्टोर्स, ऑनलाइन डिलीवरी और सुपरमार्केट में)
लंबी शेल्फ लाइफ
ब्रांड पर भरोसा
शुद्धता और सुरक्षा का दावा
पैकेट दूध की प्रोसेसिंग: अंदर की कहानी
Pasteurization यानी पास्चुरीकरण
यह प्रक्रिया दूध को 72°C तापमान पर 15 सेकंड तक गर्म करके उसके बैक्टीरिया को मारने के लिए की जाती है। इसके बाद दूध को तुरंत ठंडा किया जाता है।
Homogenization
इस प्रक्रिया में दूध की क्रीम को समान रूप से फैला दिया जाता है जिससे दूध की बनावट बेहतर होती है और मलाई ऊपर नहीं जमती।
UHT (Ultra High Temperature) Milk
कुछ कंपनियां दूध को 135-150°C पर सिर्फ 2-5 सेकंड तक गर्म करती हैं जिससे दूध बिना फ्रिज के भी 6 महीने तक चल सकता है। इस तरह के दूध में अक्सर preservatives नहीं होते, लेकिन इसके पोषक तत्वों में कमी आ सकती है।
पैकेट वाले दूध के फायदे
- साफ–सफाई और हाइजीन
ब्रांडेड दूध प्रोसेसिंग प्लांट्स में सख्त हाइजीन मानकों का पालन किया जाता है। दूध को सील पैकेज में पैक किया जाता है जिससे संक्रमण की संभावना कम होती है।
- क्वालिटी कंट्रोल
प्रत्येक बैच की टेस्टिंग होती है – फैट कंटेंट, SNF (Solid Not Fat), बैक्टीरिया लेवल आदि की जांच की जाती है।
- लॉजिस्टिक सुविधा
दूध को ठंडे तापमान पर ट्रांसपोर्ट किया जाता है जिससे इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है।
पैकेट वाले दूध के नुकसान: अनदेखा पहलू
- पोषक तत्वों की हानि
पास्चुरीकरण और UHT प्रक्रिया में दूध के कई जरूरी पोषक तत्व जैसे विटामिन B12, B2 और प्रोटीन के कुछ अंश नष्ट हो सकते हैं।
- संभावित मिलावट
FSSAI की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बिकने वाला 68% दूध या तो मिलावटी है या मानकों पर खरा नहीं उतरता। इसमें पैकेट वाला दूध भी शामिल है।
- प्रोसेसिंग से बदलता स्वाद
अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि पैकेट वाला दूध “नकली” या “प्लास्टिक जैसा” लगता है। इसका कारण अत्यधिक प्रोसेसिंग और दूध की homogenization प्रक्रिया है।
- कीमत अधिक, गुणवत्ता समान नहीं
कई बार पैकेट वाले दूध की कीमत अधिक होती है लेकिन उसकी गुणवत्ता स्थानीय डेयरी दूध से बेहतर नहीं होती।
ब्रांड्स की भूमिका और मार्केट शेयर
भारत में कुछ प्रमुख दूध ब्रांड्स हैं:
Amul: भारत का सबसे बड़ा दूध ब्रांड, 2023 में इसका मार्केट शेयर लगभग 37% रहा।
Mother Dairy
Nestlé
Nandini
Parag
इन कंपनियों की प्रोसेसिंग यूनिट्स में दूध को 30 से ज़्यादा टेस्ट से गुजरना होता है।
FSSAI और सरकार की भूमिका
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) समय-समय पर विभिन्न राज्यों में दूध के सैंपल लेकर टेस्ट करता है। इसके अनुसार:
2023 में लिए गए 3,000+ सैंपल्स में से 35% में अशुद्धियाँ पाई गईं।
अमूल जैसे ब्रांडों को भी कभी-कभी चेतावनी मिलती रही है।
उपभोक्ता क्या करें?
कैसे पहचानें असली और शुद्ध दूध?
दूध को उबालने पर यदि अधिक झाग बने और मलाई न जमे, तो उसमें प्रोसेसिंग ज्यादा हुई है।
पैकेट पर FSSAI नंबर, उत्पादन तिथि, और एक्सपायरी डेट जरूर देखें।
टेट्रा पैक दूध हमेशा लंबे समय तक चलता है लेकिन उसमें पोषण थोड़ा कम हो सकता है।
पैकेट वाला दूध आधुनिक जीवन की ज़रूरत जरूर है, लेकिन इसकी खामियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जहां यह हाइजीन और सुविधा देता है, वहीं पोषण में थोड़ी कमी और मिलावट की संभावना बनी रहती है। उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे केवल ब्रांड पर न जाएं, बल्कि हर बार गुणवत्ता की जांच खुद करें।

नमस्कार! मैं राधे, “Radhe Care” वेबसाइट का संस्थापक और मुख्य लेखक हूँ। मेरा उद्देश्य है कि हर व्यक्ति को स्वास्थ्य से जुड़ी सटीक और आसान भाषा में जानकारी प्रदान की जाए। मैं वर्षों से हेल्थ, फिटनेस और आयुर्वेदिक जीवनशैली के विषय में अध्ययन और अनुभव प्राप्त कर रहा हूँ, और इन्हीं अनुभवों को इस प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से आप सभी से साझा करता हूँ।स्वस्थ जीवन ही सुखी जीवन है। 🌿