
अंशिका, 16 साल की एक होनहार छात्रा थी। हर साल क्लास में टॉप करना, ओलंपियाड में गोल्ड मेडल लाना, और टीचर्स की तारीफें बटोरना उसकी आदत बन चुकी थी। माँ-बाप की आँखों का तारा और स्कूल की शान थी वो। हर कोई कहता था – “ये लड़की एक दिन बहुत नाम करेगी।”
लेकिन कोई नहीं जानता था कि अंशिका हर दिन एक अदृश्य लड़ाई लड़ रही थी – माइग्रेन से।
सबको लगता, “टॉपर है, किताबों में डूबी रहती है,” पर किसी ने नहीं देखा वो सिर पकड़कर अंधेरे कमरे में रोते-रोते सो जाती थी।
शुरुआत में ये दर्द कभी-कभार आता था – तेज़ लाइट में, ज़ोर से बोलने पर या खाली पेट पढ़ाई करने पर। लेकिन धीरे-धीरे यह दर्द अंशिका की ज़िंदगी में घुलने लगा, जैसे उसकी मेहनत की स्याही में कोई अदृश्य काला धब्बा बन गया हो।
“मम्मी, दिमाग फट रहा है… आँखों के आगे सब धुंधला लग रहा है…”
कहकर वो कई बार परीक्षा से पहले बेहोश सी हो जाती। माँ समझती थी, लेकिन बाकी सब कहते – “बहुत ज़्यादा सोचती है, बहुत पढ़ती है, तभी तो ये हाल है!”
एक दिन बोर्ड परीक्षा के कुछ दिन पहले, जब अंशिका का माइग्रेन अटैक सबसे तीव्र था, वो अपनी डायरी में एक लाइन लिखती है –
“क्या मेरी मेहनत का मकसद सिर्फ नंबर है, या मुझे खुद को भी सुनना चाहिए?”
डॉक्टर ने स्पष्ट कहा –
“अगर ये ऐसे ही चलता रहा, तो इसका मानसिक संतुलन और शरीर दोनों कमजोर हो जाएंगे। इसे ब्रेक की ज़रूरत है।”
माँ-पापा परेशान थे। पढ़ाई रोकने का सवाल ही नहीं था, लेकिन अब बात बेटी के स्वास्थ्य की थी।
अंशिका ने एक बड़ा फैसला लिया –
“मैं इस बार बोर्ड में टॉप नहीं करूँगी। लेकिन मैं खुद से हार भी नहीं मानूँगी।”
वो पढ़ाई जारी रखती रही, लेकिन एक रूटीन के साथ –
स्क्रीन टाइम कम किया
योगा शुरू किया
माइग्रेन ट्रिगर डायरी बनाई
नींद पूरी ली
डॉक्टर से थेरेपी ली
और सबसे ज़रूरी – अपने आप को माफ़ किया कि वो परफेक्ट नहीं है
परीक्षा आई, उसने जितना हो सका लिखा – ना टॉप किया, ना फेल हुई, लेकिन जीत गई खुद से।
आज अंशिका कॉलेज में साइकोलॉजी पढ़ रही है और माइग्रेन से जूझ रहे छात्रों के लिए एक कम्युनिटी चलाती है – “सिर का दर्द, दिल की बात”।
उसके शब्दों में –
“माइग्रेन ने मुझे तोड़ा नहीं, मुझे इंसान बनाया। नंबरों से आगे देखना सिखाया। खुद को समझना सिखाया।
हर टॉपर मुस्कुराता है, लेकिन उसकी मुस्कान के पीछे भी कहानियाँ होती हैं। माइग्रेन सिर्फ सिर का दर्द नहीं, वो मन का भी बोझ है।
हमें चाहिए कि हम बच्चों की उपलब्धियों से पहले उनके संघर्ष को पहचानें, उन्हें सुनें, समझें, और कहें – “तुम्हारा स्वस्थ रहना सबसे बड़ी जीत है।”
बदलते समय में नई चुनौतियाँ
जहाँ तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं इसके दुष्प्रभाव बच्चों की सेहत पर साफ़ नज़र आने लगे हैं। मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप और वीडियो गेम्स ने बच्चों की दिनचर्या और आदतों को पूरी तरह बदल दिया है। अब बच्चे बाहर खेलने की बजाय स्क्रीन के सामने ज़्यादा समय बिताते हैं, जिससे उनके शरीर और दिमाग पर गंभीर असर पड़ रहा है। इन्हीं प्रभावों में से एक है – बच्चों में माइग्रेन की बढ़ती समस्या। यह एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है जिसे अगर समय रहते न पहचाना जाए, तो यह बच्चों के मानसिक, शारीरिक और शैक्षणिक विकास को बाधित कर सकती है।
क्या है माइग्रेन?
माइग्रेन एक प्रकार का सिरदर्द है जो सामान्य सिरदर्द से अलग और अधिक तीव्र होता है। यह सिर के एक या दोनों तरफ़ तेज़ दर्द के रूप में महसूस होता है और इसके साथ मतली, उल्टी, रोशनी और आवाज़ के प्रति संवेदनशीलता जैसे लक्षण हो सकते हैं।
पहले माइग्रेन को सिर्फ वयस्कों की समस्या माना जाता था, लेकिन अब यह बच्चों को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है।
बच्चों में माइग्रेन के मुख्य लक्षण
माइग्रेन का दर्द बच्चों में अलग-अलग रूपों में दिखाई दे सकता है, जैसे:
सिर के एक तरफ़ या पूरे सिर में तेज़ धड़कन जैसा दर्द
रोशनी, शोर या तेज़ गंध से परेशानी
मतली या उल्टी होना
थकान, चिड़चिड़ापन
पेट दर्द
पढ़ाई में ध्यान न लगना
अंधेरे कमरे में सोने की इच्छा
कुछ बच्चों में माइग्रेन का प्रभाव इतना तेज़ होता है कि उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ता है या वह किसी भी गतिविधि में भाग नहीं ले पाते।
डिजिटल स्क्रीन और माइग्रेन: खतरनाक रिश्ता
बच्चों में माइग्रेन की बढ़ती वजहों में डिजिटल स्क्रीन का अत्यधिक प्रयोग सबसे अहम है।
आज के बच्चे औसतन 4-6 घंटे मोबाइल, लैपटॉप या टीवी स्क्रीन के सामने बिताते हैं, जो उनकी आंखों, मस्तिष्क और नींद के चक्र को प्रभावित करता है।
कैसे स्क्रीन समय माइग्रेन को बढ़ाता है?
- ब्लू लाइट का प्रभाव:
डिजिटल डिवाइसेज़ से निकलने वाली ब्लू लाइट आंखों की मांसपेशियों को थका देती है और दिमाग को अत्यधिक उत्तेजना देती है, जिससे माइग्रेन की संभावना बढ़ जाती है।
- नींद की कमी:
बच्चों की नींद का समय लगातार कम होता जा रहा है। देर रात तक मोबाइल देखना उनकी नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, और नींद की कमी माइग्रेन का एक प्रमुख कारण है।
- आंखों पर दबाव:
लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों की आंखों में थकान, जलन और दबाव उत्पन्न होता है, जो माइग्रेन को ट्रिगर कर सकता है।
- तनाव और सोशल मीडिया का दबाव:
बच्चे अब कम उम्र में ही सोशल मीडिया के संपर्क में आ रहे हैं। लाइक्स, कमेंट्स, गेमिंग स्कोर जैसी चीजें बच्चों में मानसिक दबाव बढ़ाती हैं।
माइग्रेन के अन्य कारण
डिजिटल स्क्रीन के अलावा माइग्रेन के और भी कई कारण हो सकते हैं:
अनियमित खानपान
हाइड्रेशन की कमी (पानी कम पीना)
अत्यधिक धूप में रहना
तेज़ गंध या तेज़ आवाज़
हार्मोनल बदलाव (विशेषकर किशोरियों में)
आनुवंशिक कारण (फैमिली हिस्ट्री)
कैसे पहचानें कि बच्चा माइग्रेन से पीड़ित है?
अक्सर बच्चे अपने दर्द को सही ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते। ऐसे में माता-पिता को कुछ संकेतों पर ध्यान देना ज़रूरी है:
बच्चा बार–बार सिरदर्द की शिकायत करता है
टीवी या मोबाइल से जल्दी थक जाता है
तेज़ रोशनी में आँखें बंद कर लेता है
चिड़चिड़ा व्यवहार करता है
खाने या खेलने का मन नहीं करता
पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता
अगर ये लक्षण लगातार बने रहें, तो बिना देर किए बाल रोग विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें
माइग्रेन से बचाव: माता–पिता क्या कर सकते हैं?
- स्क्रीन टाइम सीमित करें
बच्चों के मोबाइल, टीवी और टैबलेट उपयोग का समय रोज़ाना तय करें। विशेषज्ञों के अनुसार 5-18 वर्ष के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम अधिकतम 1 से 2 घंटे होना चाहिए।
- नींद का समय सुनिश्चित करें
बच्चों को रोज़ 8-10 घंटे की गहरी नींद मिलनी चाहिए। सोने से पहले मोबाइल या टीवी से दूरी बनाना ज़रूरी है।
- संतुलित आहार दें
प्रोटीन, हरी सब्जियाँ, फल, दूध, नट्स और पर्याप्त पानी बच्चों की सेहत को मजबूत बनाते हैं और माइग्रेन को कम करते हैं।
- फिज़िकल एक्टिविटी को बढ़ावा दें
बच्चों को खेलकूद और आउटडोर गतिविधियों में शामिल करें। इससे तनाव घटेगा और दिमाग ताज़ा रहेगा।
- स्क्रीन से आंखों को आराम दें
हर 20 मिनट पर 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखें (20-20-20 रूल)। यह आंखों के तनाव को कम करता है।
माइग्रेन का इलाज कैसे होता है?
बच्चों में माइग्रेन के इलाज में सावधानी बरतनी चाहिए। डॉक्टर आमतौर पर इन उपायों की सलाह देते हैं:
दर्द निवारक दवाइयाँ (डॉक्टर की सलाह से)
ट्रिगर फैक्टर से बचाव
लाइफस्टाइल में बदलाव
सिर पर ठंडी पट्टी लगाना
विश्राम और ध्यान (Relaxation Techniques)
कई मामलों में माइग्रेन जीवनशैली सुधार से ही नियंत्रित हो जाता है और दवाइयों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
डिजिटल सुविधाएँ, सीमाओं में ही ठीक
डिजिटल युग ने बच्चों को नई दुनिया से जोड़ा है, लेकिन उसी के साथ गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। माइग्रेन एक ऐसी ही चेतावनी है, जो बताती है कि बच्चों को तकनीक से जोड़ने के साथ-साथ उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर भी ध्यान देना जरूरी है।
माता–पिता, शिक्षकों और समाज को मिलकर इस ओर सजगता लानी होगी। बच्चों को मोबाइल से ज़्यादा मैदान, रोशनी से ज़्यादा आराम और लाइक्स से ज़्यादा प्यार की ज़रूरत है।
नमस्कार! मैं राधे, “Radhe Care” वेबसाइट का संस्थापक और मुख्य लेखक हूँ। मेरा उद्देश्य है कि हर व्यक्ति को स्वास्थ्य से जुड़ी सटीक और आसान भाषा में जानकारी प्रदान की जाए। मैं वर्षों से हेल्थ, फिटनेस और आयुर्वेदिक जीवनशैली के विषय में अध्ययन और अनुभव प्राप्त कर रहा हूँ, और इन्हीं अनुभवों को इस प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से आप सभी से साझा करता हूँ।स्वस्थ जीवन ही सुखी जीवन है। 🌿